पक्का सौदा आश्रम रूहानी कॉलेज सदलपुर

शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

इन्सान के नियम: मनुष्य कुल मर्यादा और मानवता के नियम क्यों भूल जाता है?

 इंसान अपने नियमों से भटक क्यों जाता है।

बहुत से लोगों को मैंने देखा है घर से कुछ संस्कार पाकर पढ़ लिखकर लड़के एक राज्य से दूसरे राज्य में नौकरी करने के लिए जाते हैं। वहां जाने के बाद में देखते हैं कि यहां के नियम कैसे हैं? अच्छा बुरा कार्य करने पर क्या कोई अधिकारी डांटता है या रोकता है। यह उनका लगभग 1 महीने में पता चल जाता है एक महीने बहुत शराफत की जिंदगी जीते हैं फिर दूसरे कर्मचारियों का व्यवहार देखकर खान-पान वेशभूषा बड़े अधिकारियों के वेशभूषा व्यवहार को देखकर, अपना व्यवहार आचरण जो नियम घर से सीखकर आए थे। वह सब भूल जाते हैं जैसे दूसरे कर्मचारी रहते हैं वैसे रहना शुरू कर देते हैं और वैसी ही आदत अपना लेते हैं। देखो जरा गौर करो
 इंसान अपना भूल कर अपने सनातन धर्म के नियम भूल कर करता उल्टे काम।
बंदा अगर सोच कर देखें क्या मिल सकता है उनका भविष्य में आराम।।

बचपन में माता-पिता बच्चों को अच्छी शिक्षा देते हैं ।

माता-पिता द्वारा बच्चों की रक्षा।

 मैं देश में बहुत से कर्मचारी देखें उनके माता-पिता नौकरी करने के लिए भेजते हैं वहां वे जाने के बाद दूसरे कर्मचारियों के साथ नशा विषय करना, मांस खाना, गलत भाषा बोलना गलत शब्दों का प्रयोग करना शुरू कर देते हैं जानो प्रिय ज्ञानी सतपुरुषो सोच समझ कर देखो कि तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें इतना बड़ा किया और सदा उच्च भोजन करवाया। और कभी भी धूम्रपान नशा करने की चीज नहीं दी। 
माता-पिता ने कभी यह नहीं कहा कि बेटा बड़े होकर तुम नशा करना, धूम्रपान करना। कभी भी गलत आदत नहीं सिखाई , स्कूलों में विद्यालयों में कभी गलत आदतें नहीं सिखाई। उसके बाद अगर विश्वविद्यालय में भी पढ़ें है तो वहां भी अच्छा आचरण सिखाया जाता है। कोई भी स्कूल और विश्वविद्यालय गलत भाषा का प्रयोग करना नहीं सिखाता। वह तो यह मनुष्य ही है जो अपनी मर्जी से बुराइयों को अपना लेता है। उन्होंने सदा ही सत का रास्ता बताया है और जब आप घर से निकलकर नौकरी के दौरान नशा विषय मांस खाना क्यों शुरू कर देते हो।

 फिर मैंने प्रश्न किया कि 

आप नशा क्यों करते हो?

  उत्तर मिला बोले की बस ऐसे ही शोख में करते हैं।
 अब आप देखो शरीर को बिगाड़ने के लिए उसे गंदी नालियों में गिरने के लिए लोग सोख करते हैं।
 जिस प्रकार आप यहां गलत भाषा शब्दों का प्रयोग करते हो क्या घर पर भी ऐसे बोलते हो?
 बोले कि नहीं घर पर नहीं बोलते, पर कई बार शब्द निकल जाते हैं। क्योंकि यहां की आदत पड़ चुकी है।

 क्या आपको नशा विषय करते समय कोई नहीं देखता?

 बोले कि हां हमें यहां पर कोई नहीं देखता मां-बाप तो घर पर है कोई भी आसपास घर का नहीं है और हम यहां पर अपना सोख पूरा कर रहे है।

 क्या नशा, विषय करना, मांस खाना सही है या गलत?

 बोले की है तो गलत ही पर आदत लग गई है।
इस उम्र में ज़िन्दगी आपके हाथ में आप कैसे जिओ?

 माना कि तुम्हारे माता-पिता यहां नहीं देख रहे परंतु तुम खुद को धोखा दे रहे हो क्योंकि यह जिंदगी तुम्हारी है तुम्हारे माता-पिता ना देख रहे हैं कोई बात नहीं परंतु तुम खुद देख रहे हो तुम कहते हैं कि हमें कोई नहीं देख रहा इस बात पर तुम खुद को कुछ भी नहीं मान रहे खुद का अपमान कर रहे हो कि
तुम्हें किसी ने भी नहीं देखा, यह भूल है
तुम्हारी अभी वक्त है सुधारो अपने भूल। फिर बाद में पछताने से क्या होगा जब जम जाएगी धुल।।
 आपने खुद की कीमत ना जानी, खुद को कुछ नहीं समझा
 खुद की कीमत जानो तुम 
मानो तो प्रकृति की मानो तुम।
सफर अभी बाकी है 
खुद को खुद ने देखा यह जानो तुम।।

 बोले हमको कोई नहीं देखता
 तुमको देख रहा सारा ब्रह्मांड जो तुझ में है समाया।
 अपनी कीमत जान ले अपना रखी यह है उल्टी माया।।
 जिस बुराइयों को आज जानकर तुम पकड़े बैठे हो वह अभी पक्की नहीं हुई है छोड़ सकते हो क्योंकि तुम बुराइयों की आदत छोड़ सकते हैं। परंतु जब तुम लगातार नशा विषय करते रहोगे तब बुराइयों को आपकी आदत पड़ जाएगी फिर वह तुमको नहीं छोड़ेगी क्योंकि व्यक्ति जब नशा विषय करना, मांस खाना शुरू करता है तब प्राकृति, शरीर को खांसी देकर या उल्टी करवाकर इशारा करती है। उस समय व्यक्ति इनको नहीं समझता और प्रकृति के शरीर के विरुद्ध चलता रहता है बुराइयां अपनाता रहता है इससे नशा विषय को छोड़ नहीं पाता शरीर बिल्कुल जर्जर हो जाता है। प्रकृति बोलती है जब पहले मैं इशारा किया तब मेरी बात नहीं मानी अब मैं तुम्हारी बात क्यों मानूं और मनुष्य जीवन गवा देता है।
 
पहले खुशी-खुशी नशा अपनाया समझा ना मां प्रकृति का इशारा ।
लगातार नशा करता रहा बोला नशा है प्यारा।
 बुराइयां तो बुराइयां हैं बुराइयां करके छुपता रहा और छुप छुप कर बुराइयां अपनाता रहा वह भूल में है कि यह किराए का तन नहीं है हमारा।।

 जो नशा, विषय तुमने अपना रखा तेरा है यह पतन,
 छुट ना पायेगा इससे चाहे लाख करो जतन।
कुछ देने से भी पीछा ना छूटे तुम्हें गवांना पड़ेगा यह तन।।
 बंदा कितना अज्ञान है? बोलता है।
 सब करते हैं इसलिए हम भी करने लगे सौख में यहीं जीवन मिला है मजा ले लेते हैं जी भर के।
 सोचो जरा विचार करो 
हीरा तन मिला अनमोल, 
इसमें जहर कभी मत घोल।
 अपने नियमों पर अडिग रहो, 
चाहे आ जाए कैसी ही झोल।।

 सब जैसा तुम मत बनो, बनो परम पुरुष। 
सब करते हैं वह मत करो बनो इंशान।।

 अगर तुम अपने आप को बड़ा बनना चाहो तो पहले बड़े नियम अपनाओ जिसने बुरा किया तुम भी बुरा करोगे तो उसमें और तुझ में क्या अंतर है?
किसी का नाम छप जाता है और किसी का नाम छुप जाता है।
 तुम अपना नाम छिपाना चाहते हो या तुम अपना नाम छपवाना चाहते हो वह तुम्हारे कर्मों पर निर्भर है।
 अगर जग में नाम कामना है तो तुम्हें अलग करना होगा।

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