अंधविश्वास क्या है अंधविश्वास जब कोई किसी चीज को प्रथा को बिना किसी कारण वश अपना लिया जाता है उस पर ऐसा विश्वास कर लिया जाता है कि इसके बिना कुछ संभव नहीं है बिना देखे बिना जाने कोइ प्रथा बनाकर या पहले से बनी हुई कोई अनावश्यक चीजों इसके महत्व और गुण और कर्मों के बारे में पता ही नहीं, पर विश्वास करना अंधविश्वास है।
यह मनुष्य स्वार्थ के लिए अंधविश्वास अपना बैठा है कुछ को इसके बारे में ज्ञान ही नहीं बहुत से लोग बस देखा देखी मैं चल रहे हैं।
हम यहां पर बहुत से उदाहरणों का जिक्र करेंगे।
इन उदाहरणों को जानों और विचार करो इन को जानोंगे तो पता चलेगा।
हनुमान जी का सूर्य निगलना
सब लोग यह जानते हैं कि हनुमान जी ने सूर्य को मुंह में डाल लिया लेकिन सच्चाई कुछ और है सच्चाई यह है कि हमारे शरीर में दो स्वर हैं एक दायां स्वर और एक बायां स्वर दायां स्वर, सूर्य स्वर और बायां स्वर चंद्रमा स्वर होता है। हनुमान जी ने दायां स्वर चलते समय ध्यान लगाया था इसलिए पूरे शरीर में अंधेरा छा गया इसलिए बोलते हैं कि तीनों लोकों में अंधेरा छा गया क्योंकि यह तीन लोक हमारे शरीर में भी है।
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| जब हनुमानजी ने ध्यान लगाया। |
हनुमान जी द्वारा सोने की लंका जलाना
जब हनुमान जी ने ध्यान लगाया तब सूर्य स्वर चल रही थी। जब सूर्य स्वर के चलते ध्यान लगाते हैं तब घट गंगा बहने लगती है। और शरीर का सारा मल साफ हो जाता है और शरीर सोने की तरह चमकने लगता है इसी तरह कहा गया है की लंका सोने की हो गई।
शिव जी के साथ मिट्टी के बने हुए सांप की पूजा और जिंदे को देते मार
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| कभी सांप को मत मारना |
आज हमारे समाज में क्या हो रहा है यह आप देख रहे हो जब भगवान शिव की पूजा करते हैं तब साथ में सर्प की भी पूजा करते हैं। परंतु जब घर में कहीं पर सांप दिखे जाए तो देखते ही उसको मार देते हैं। देखो क्या हो रहा है? मिट्टी के सांप की पूजा हो रही है और जिंदे सांप को मार देते हैं।
गणेश जी के साथ मिट्टी के बने हुए चूहे की पूजा और जिंदे को देते मार
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| गणेश जी की पूजा फिर चूहे को किसलिए मारना। |
जब जब गणपति देव की पूजा होती है तब साथ में चूहे की भी पूजा होती है परंतु जब घर में कहीं पर दिख जाए तो देखते ही उसको मार देते हैं और उसके लिए पिंजरा लगाए रखते हैं जब आप गणपति देव को पूछते हो तो पूजनीय वह चूहा भी है। यह ऐसा काम स्वार्थी लोग करते हैं कि हमारा काम बन जाए दूसरे मरे तो मरे। यह भी प्रकृति की जीव है इनको कभी नहीं मारना चाहिए।
ग्यारस पर चावल खाना मना क्यों
ग्यारस के दिन चावल खाने को मना किया जाता है परंतु चावल तो एक देवताओं का पवित्र भोज है इसलिए आप अनुभव करके देख लीजिए और चावल खाने से ग्यारस के दिन कुछ नहीं होता भ्रम शंका और अंधविश्वास से दूर हो जाओ
बली प्रथा: किसी भी जीव की बलि देना।
किसी की जान जाए तो जाए सब अपने स्वार्थ में लगे हुए हैं बोलते हैं की बली नहीं चढ़ने से माता रूठ जाएगी और क्रोधित होकर हमें नष्ट कर देगी या हमारी इच्छा पूर्ती नहीं करेगी।
सब लोग अपने स्वार्थ में लगे हुए हैं बोलते हैं कि यह देवी यह चीज की मांग करती है यह देवता इस चीज की मांग करता है परंतु प्रिय ज्ञानी सत्पुरुषों कोई भी देवता देवी किसी चीज की मांग नहीं करते। अगर आप ऐसा करते हो या नहीं बल्कि देते हो तो आप अपने ऊपर कर्मों का कर्ज ओर बांध रहे हो, माता देवी देवता कभी किसी से रुष्ट नहीं होते वह सबसे प्रेम करते हैं यह जीव उन्हीं के बने हुए हैं अगर आप इन जीवन से प्रेम करते हो तो वह भी तुमसे प्रेम करेंगे आप आजमाइश करके देख लीजिए बलि न चढ़ाने से माता कभी रुष्ट नहीं होती है। यह सब अपने स्वार्थ के लिए अपना रखा है। परंतु इससे इनका कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं होता बल्कि इससे नुकसान ही होता है।
इस माता की प्रसाद मत खा लेना यह माता धुका लेगी, चिप जाएगी।
आज समाज में भ्रम भ्रांतियां फैली हुई है कि इस देवी की प्रसाद मत खा लेना उस देवता की प्रसाद मत खा लेना ऐसा हो जाएगा इसको पूजना पड़ जाएगा। प्रिया ज्ञानी सत्पुरुषों ऐसा करने से कुछ नहीं होता आप किसी देवी देवताओं की प्रसाद खा सकते हैं। किसी भी प्रसाद का कभी अपमान नहीं करना चाहिए, आप जैसी भावना रखोगे वैसा ही होगा।
पुच्छा देखने वालों के पास दर दर भटकना।
वर्तमान समय में मानवता डगमगा गई है और दर-दर भटकती है कोई सोचता है वहां फायदा मिलेगा कोई सोचता है वहां फायदा मिलेगा सच तो यह है कि जिसने खुद को नहीं जाना उसको सदा भटकान ही बनी रहती है। आप कहीं भी कभी भी भट्ट को मत परमात्मा ने सब कुछ तुम्हारे शरीर में दिया है सारे देवी, देवता, पूरा ब्रह्मांड आपके शरीर के अंदर समाया हुआ है बस देर है तो आपको खुद को जानने की देर है आप किसी के पास जाओगे तो सब अलग-अलग बातें बताएंगे जिससे आपको और ज्यादा भटकान पैदा हो जाएगी इसलिए कहीं मत भटको अपने आप को जानों, जिसने अपने आप को जान लिया उसने परमात्मा को जान लिया।
बाबाओं के चक्कर में बिना जाने भटकना।
वर्तमान समय में बाबाओ की बाढ़ आई हुई है परंतु सभी संत नहीं होते संत तो कोई कोई होता है संत वह होता है जिसका खुद का इतिहास हो जिसके अंदर परमपिता परमात्मा की वाणी आकर बोलती हो ज्ञान देती हो जो सदा मानवता की भलाई के लिए कार्य करता हो।पानी पियो छानकर गुरु बनाओ जानकर।
संत के गुना को जानो संत कभी भी खुद को पूजने की नहीं कहता वह कहता है की प्रकृति के नियम अपनाओ और खुद संत बन जाओ।
प्रकृति की पूजा करें ।
अंधविश्वास भ्रम भ्रांतियां से दूर हो जाइए
सबसे पहले अपने सनातन धर्म में मां प्रकृति की पूजा होती थी मां प्रकृति के नियम अपना लीजिए और उसी की पूजा कीजिए क्योंकि सब
की इच्छाएं मां प्रकृति पूरी करती है।



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