आज मौके पर देश दुनिया में अनेकों ऐसे लोग हैं जो अपने आप को संत बता रहे हैं! क्या वह वास्तव में संत हैं? अगर वह वास्तव में संत है तो जाति धर्म को लेकर लड़ते झगड़ते क्यों हैं? वह एक दूसरे को अभद्र भाषा में क्यों बोलते हैं? एक दूसरे में दोष क्यों बताते हैं? एक दूसरे को नीचा क्यों दिखाते हैं? एक दूसरे का अपमान क्यों करते हैं? क्या एक संत का यही काम है? क्या एक संत का काम दिखावा करना है? क्या एक संत को आभूषण पहनना बड़े-बड़े महलों में रहना वेद शास्त्र पढ़ पढ़ कर ज्ञान देने वाला, मनघड़त कहानीयां कहने वाला, बहुत सारी संपत्ति खुद के नाम करने वाला, जीवन को सताने वाला क्या वह संत है? क्या उसे संत कह सकते हैं जो संगत को मझधार में छोड़कर भाग जाए क्या जो ऊपर बताए हैं इनमें से कोई संत है? क्या इनको संत कह सकते हैं? क्या हथियार रखने वाला, दूसरों की संपत्ति हड़पने वाला, मोह माया में पड़ने वाला, दूसरों की देह को सताने वाला, दूसरों को दबाकर रखने वाला, कुकर्मों के कारण जेल में जाने वाला क्या संत हो सकता है? जो ऊपर बताए गए हैं इनमें से जो भी गुण रखता है वह संत नहीं आम आदमी है संत की वास्तविक पहचान इन सबसे अलग है। इन आम आदमी को कभी संत नहीं कहा जा सकता।
संत की पहचान
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| परम संत की पहचान |
प्रिय ज्ञानी सतपुरुषों संत सत की ताकत होता है वह कभी भी दुनियावी बात नहीं करता कभी किसी की गाई नहीं गाता वेद, पुराण, शास्त्र पढ़ कर ज्ञान नहीं देता, संत पूर्ण होता है। वह खुद की वाणी परमात्मा की ओर से आई हुई वाणी लिखता है और ज्ञान देता है। उनका कोई देह धारी गुरु नहीं होता उनकी कला प्रथम होती है जो नया इतिहास रचती है। वह सबको सदा भलाई का रास्ता बताते हैं जिनमें शीलता, संतोष, नम्रता और शांति होती है वही संत होते हैं वह मां प्रकृति के बताए हुए नियमों पर चलते हैं। सब की इज्जत करते हैं और मेहनत का खाते हैं।
अनावश्यक साज सज्जा ,महलों से दूर रहते हैं संत खुद दुखी हो सकता है लेकिन दूसरों का दुख नहीं देखता ,सदा तन, मन, धन से दुखियों की भलाई में लगा रहता है लोगों का दिया हुआ दान उनका पैसा उन्हीं पर ही लगता है और लगाना भी ऐसे कि उनकी कमाई का पैसा व्यर्थ न जाए और कई गुना काम आ जाए, कोई ₹100 दान करता है तो संत उसे हजार गुना ज्यादा काम में लेने की सोचते हैं यह संत ही कर सकते हैं समाज को निस्वार्थ सेवा करने वाले सदा भलाई के लिए बोलने वाले, शुद्ध भाषा का प्रयोग, ऐसे संत के खुद के ग्रंथ, शब्दावली और खुद की भाषा होती है वह बने बनाए रास्ते पर नहीं चलते बल्कि खुद नया रास्ता बनाते हैं और सदा नई भाषा का ज्ञान कराते हैं प्रिय ज्ञानी सत पुरुषो आप संत की पहचान करो संत ही परिवार, समाज, देश का उत्थान कर सकता है। संत, संत होता है आम आदमी को संत नहीं कहा जा सकता।
संत में क्या-क्या गुण होने चाहिए?
जिस इंसान में
- तन के तीन दोष:- चोरी, जारी, हत्या।
- मन के तीन दोष:- ईर्ष्या, घमंड, मनसा पाप।
- जुबान के चार दोष:- कड़वा वचन, झूठ, चुगली, चापलूसी।
यह 10 अवगुण जिस इंसान में होते हैं वह संत नहीं बल्कि आम आदमी होते हैं। अगर यह दोष न हो तो वह आम आदमी नहीं बल्कि एक अच्छे संत का रूप है।

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