करणी-भरणी: कर्म का फल कैसे और किसे मिलता है? प्रिय ज्ञानी सतपुरुषो जो इंसान इस धरती पर आता है वह कर्म करता है कर्म के कारण ही उसकी कर्म रेखाएं बनती हैं। कर्म के कारण उसका भविष्य निर्धारित होता है। जिसने वर्तमान में रहकर उच्च कर्म किया उसका फल भी उसे अवश्य ही अच्छा मिलता है। कर्मों के कारण ही इंसान पूजा जाता है कर्म के कारण ही वह भगवान कहलाता है। परमात्मा ने तुम्हें हीरा रूपी शरीर देकर कहां की इस शरीर की चाबी तुम्हारे हाथ में अब जैसा तुम करोगे वैसा ही तुम पा लोगे। फल की चिंता मत कर कर्म कर रे इंसान जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान। अब सब यह जानते हैं कि कर्म का फल जरुर मिलता है परंतु आज का मनुष्य यह भूल गया है कि कर्म क्या करें? आज का मनुष्य अच्छे और बुरे कर्म में भेद भूल गया है।
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| कर्म का खेल निराला |
हमारे शरीर की 10 इंद्रियां हैं इन इंद्रियों से जो भी काम किया जाए वह कर्म में आता है वह कर्म बन जाता है जिसमें आंख, नाक, कान, जिव्या, हाथ, पैर और गुप्ताअंग। यह तन रूपी शरीर के 10 घोड़े हैं इसकी लगाम परमात्मा ने इंसान के हाथ में दी है। जब मनुष्य इसकी लगाम ढीली छोड़ देता है तब यह बुराइयों की ओर चलना शुरू हो जाती है और मनुष्य को ले डूबती है परंतु जब मनुष्य इंद्रियों की लगाम अपने हाथ में रखता है उन्हें अपने तरीके से चलाता है तब वह डिगता नहीं और सत पर चलता रहता है। यह कर्म है जो मनुष्य को चढ़ा दे यह कर्म है जो मनुष्य को गिरा दे जान लो और मान लो सत कर्म को पहचान लो। कर्म के कारण जन्म लेता और कर्म के कारण देह को देता त्याग, कर्म के कारण शादी होती कर्म के कारण शादी निभती शादी के बाद कर्म के कारण सुख और दुख मिलता। सारा खेल कर्म का है जो प्रभु से करवाता मेल। इसलिए कर्म की पहचान करो साधो भाई। कोई छुपकर कर्म करे सोचे कि मुझे कोई देखता नहीं यह उसका भ्रम है कि उसको कोई देखता नहीं जो दीवार के पीछे यहां परदा के पीछे दिखता नहीं यह तो परमात्मा का कैमरा है जो तेरे अंदर लगा कर रखा है जिसमे परमात्मा तुम्हारी ऑडियो वीडियो फोटो लेता है और तुम्हारी हर क्रिया को रिकॉर्ड करता है वह ऐसा कैमरा है जो ना पानी में भिगता है, ना टूटता, ना कभी खराब होता है। यह वह कैमरा है, चोरी जारी हत्या करके बंदा छुप जाता है सोचता है कि मैं बड़ा होशियार हूं, चालाक हूं, बहुत तेज हूं। छुपने के बाद सोचता है अब मुझे कोई नहीं ढूंढ़ सकता। पर वह जानता नहीं जीव बड़ा भोला है कि तुझसे चालाक, होशियार, तेज और भी है क्योंकि तुझे बनाने वाले को तुमने जाना ही नहीं है। यह कर्म है। कर्म पीछा करता है। 10 इंद्रियों से जो तुम कर्म करते हो अच्छा बुरा वह उसी समय तुम्हारे पीछे हो जाते हैं जैसे बोलना एक कर्म है जो बोला वह ब्रह्मांड में फैला मां प्रकृति के अनुकूल बोलोगे तो वह साथ देने के लिए पीछा करना शुरू कर देता है और जो बुरा बोलता है वह भुगतान करने के लिए पीछा करना शुरू कर देता है यह कर्म है कर्म की पहचान करो। जिस प्रकार बैंक में पैसा जमा किया वह मिलता ब्याज लगाकर इस प्रकार तेरे बोल हैं जो बोलने के बाद ब्रह्मांड में फैले यह ब्रह्मांड दुनिया का सबसे बड़ा बैंक है जो देगा ब्याज लगाकर अब तुम जानो क्या बोले मिलेगा वही जो बोलोगे। हे परमपिता परमेश्वर ज्ञान कराओ जीव बडा़ भोला है।
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| कर्म के कारण बदलती दशा। |
यह कर्म है जो कदम कदम पर करना पड़े। कर्म तेरे हर पल की परीक्षा इसलिए सोच समझ कर कर्म करो कर्म ही तुझे राजा बना दे कर्म बना दे भिखारी यह तुम्हारे कर्म पर निर्भर करता है।
कर्म की 10 इंद्रियां
इन इंद्रियों से जो भी तुम करो वह सब कर्म ही है।
कर्म की गठरी बांधकर जग में फिरे इंसान जैसा करे वैसा भरे यहीं विधि का विधान जैसे:-
आंख:- आंख का काम है देखना यह देखने का काम करती है जो देखा फिर वही किया और फल पाया। मनुष्य की सोच होनी चाहिए कि मैं इन आंखों से कभी बुरा ना देखूं।
नाक:- यह सांस लेने और छोड़ने का कर्म करती है। प्राणवायु से शरीर के अंदर जाती है जो आत्मा का रूप है यह कर्म है तुम गिनती नहीं करते पर मालिक, यह ब्रह्मांड की ताकत एक-एक सांस गिनती करती है।
जिव्या:- यह इंद्री दोहरे गुणों वाली हैं यह बोलने का काम करती है और जब भोजन करते हैं तब स्वाद बताती है इसके दोहरे काम है जो बोलोगे वह कर्म है और जो खाओगे वह भी कर्म है। क्या अच्छा बोलना क्या बुरा बोला, इसमें तुम स्वतंत्र हो आपको चाहिए अच्छा सुनना अच्छा लगे तब अच्छा बोलो शुद्ध भाषा का प्रयोग करो। भोजन के समय भोजन का स्वाद बताती है जिव्या के स्वाद पर आप कितना काबू रख पाते हैं वह आप पर निर्भर है।
कान:- यह कर्म इंद्री है जो सुनने का काम करती है। सुनना इसका कर्म है इंसान जैसा सुनता है वैसा कहता है अच्छा सुनोगे तब सामान्य सी बात है कि अच्छा ही कहोगे। यह कर्म है।
हाथ:- यह कर्म इंद्री है अपने हाथ से, क्या करते हो किसी को दान किया या धर्म किया किसी की रक्षा की या किसी को लूटा, इन हाथों से किसी को सताया इन हाथों से किसी को मारा, यह कर्म है जो कर्म जिससे करते हैं वह कर्म उसी से ही चुकाना पड़ता है।
पैर:- पैर कर्म इंद्री है यह चलकर कहां गए किसके ऊपर पैर रखा यह कर्म है किसको ठोकर मारी किसको नमस्कार किया चलो सावधानी से कहीं चिट्टी भी ना मर जाए तुम्हारे पैरों से वह भी हमारे समान है प्रकृति की जीव है जो भरती अपना पेट, सावधानी हटी दुर्घटना घटी तुम जानो अपने आप को, यह कर्म है।
गुदा:- यह गुप्त इंद्री है जिससे मल का त्याग होता है। यह कर्म इंद्री है।
लिंग:- यह दोहरी गुणों वाली इंद्री है जो करती है भोग और करती मल का त्याग जिसको सताया जान ले, यह कर्म है इसका भुगतान करना ही पड़े। वर्तमान में इसी के वशीभूत होकर मनुष्य सबसे ज्यादा कुकर्म करता है और प्रकृति के नियम से डिग जाता है और बड़ा भारी कुकर्मों का बोझ बांध लेता है।
सहस्त्र:- यह कर्म इंद्री है जब ध्यान लगाओ तब पता चले कि यह कहां है पता लगने के बाद इंसान कर्म करता है सोच समझकर इसको जानने के बाद सारे कर्मों में सुधार आना शुरू हो जाता है यह कर्म है कर्म की पहचान करो। जो किया वह भरना पड़े जैसी करनी वैसी भरनी दूसरे की चिंता मत करो खुद की करो संभाल कर्म को पहचान लो, मिट जाता सारा जंजाल जंजाल मिटने से सारी व्याधि दूर होती और कर्म की हो जाए पहचान यह तन मिला कर चलो कुछ ऊंचा नाम रोशन जग में,जब सत्कर्म करने लगोगे तब जान जाओगे खुद को, बनकर चमको सितारा ताकि इस जीवन जीने का धोखा ना रहे। कर्म अगर कुकर्म किया है तो जीवन भर रहेगा संकट मरते दम तक ना आएगा चैन, कर्म अगर सत्कर्म किया है तो हरदम खुशियां और आनंद ही आनंद जीवन में रहेगा।


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